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बिना निमंत्रण पिता, गुरु और सच्चे मित्र के यहां जाना अनुचित नहीं: बालकृष्ण दास जी महाराज

दूसरे दिन की कथा सुनकर श्रोता हुए भाव विभोर

*सिंगरामऊ।** क्षेत्र के मेढ़ा गांव में प्रधानाचार्य शिवकुमार तिवारी के मुख्य यजमानत्व एवं उनके सहयोगी क्षेत्रीय यजमान श्रद्धालुओं के सानिध्य में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के प्रथम एवं द्वितीय दिवस पर अयोध्या धाम से पधारे कथा व्यास परम पूज्य बालकृष्ण दास जी महाराज ने भगवान श्रीराम के नाम की महिमा, नारद मोह प्रसंग तथा माता सती और राजा दक्ष के यज्ञ की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया।

कथा के प्रथम दिवस महाराज जी ने राम नाम की महिमा का बखान करते हुए कहा कि राम नाम का स्मरण करते ही दसों दिशाओं में मंगल ही मंगल हो जाता है। राम नाम के प्रभाव से गिद्धराज जटायु, अजामिल और ध्रुव जैसे भक्तों का उद्धार हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने भी उल्टा नाम जपकर भगवान की कृपा प्राप्त की। नारद मोह प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा माता के समान करते हैं। जिस प्रकार माता अपने बच्चे के घाव को ठीक करने के लिए कभी-कभी कठोर उपाय अपनाती है, उसी प्रकार भगवान भी भक्तों के कल्याण के लिए आवश्यक कदम उठाते हैं।

उन्होंने भगवान शिव को समता का प्रतीक बताते हुए कहा कि उनके सानिध्य में चूहा, सर्प, गरुड़ और नंदी जैसे परस्पर विरोधी स्वभाव वाले जीव भी एक साथ रहते हैं।

कथा के दूसरे दिन महाराज जी ने कहा कि पिता, गुरु और सच्चे मित्र के यहां जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। इन संबंधों का आधार प्रेम, श्रद्धा और आत्मीयता है। जहां सम्मान और अपनापन हो, वहां औपचारिक निमंत्रण की अपेक्षा नहीं की जाती, लेकिन प्रत्येक परिस्थिति में मर्यादा का पालन आवश्यक है।

माता सती और भगवान शिव के प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि माता सती ने भगवान श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए माता सीता का रूप धारण किया था, जिससे भगवान शिव अप्रसन्न हुए। इसके बाद राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया। पिता के मोहवश माता सती बिना निमंत्रण के यज्ञ में पहुंच गईं। वहां राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया और यज्ञ में उनका भाग भी नहीं रखा। इससे आहत होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।

इस घटना से क्रोधित भगवान शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र और भद्रकाली को उत्पन्न किया, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया। कथा के अंत में महाराज जी ने भगवान श्रीराम के जन्म के विभिन्न कारणों का विस्तार से वर्णन किया।

कथा के दौरान श्रद्धालु भक्तिभाव से भावविभोर होकर भगवान श्रीराम के जयकारे लगाते रहे।