15 जनवरी 2026: मकर संक्रांति का पावन पर्व, सूर्य के उत्तरायण होने का शुभ संदेश

*15 जनवरी 2026: मकर संक्रांति का पावन पर्व, सूर्य के उत्तरायण होने का शुभ संदेश*

*(आचार्य अरविंद कुमार उपाध्याय)*इस साल 15 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा. ज्योतिष गणना के अनुसार, अब 2080 तक मकर संक्रांति का त्योहार 15 जनवरी को ही मनाया जाएगा. उन्होंने बताया कि सूर्य के मकर राशि में जाते ही खरमास समाप्त हो जाएगा और मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे.

 

इस साल मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मान्य है और इस दिन वृद्धि योग, शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि और ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग भी रहेगा. शास्त्रों के अनुसार, उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा जाता है. आचार्य अरविंद उपाध्याय ने बताया कि मकर संक्रांति के दिन साधारण नदी भी गंगा के समान हो जाती है. इसलिए इस दिन पवित्र नदीं में आस्था की डुबकी लगाना शुभ माना गया है.

ज्योतिषविदों के अनुसार, हर साल सूर्य के राशि परिवर्तन में 20 मिनट का अंतर आ जाता है. इस प्रकार तीन वर्षों में यह अंतर बढ़कर एक घंटा हो जाता है. जबकि 72 वर्षों में 24 घंटे का फर्क आ जाता है. सूर्य और चंद्रमा ग्रह मार्गीय होते हैं. यह पीछे नहीं चलते हैं. इसलिए हर 72 साल में एक दिन बढ़ जाता है.

 

इस गणना को साल 2008 में ही 72 वर्ष पूरे हुए थे. हालांकि छह वर्षों से सूर्य का राशि परिवर्तन प्रातःकाल में होने से पूर्व काल मानकर मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जा रही है. उन्होंने आगे बताया कि 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही थी. हालांकि 1864 से 1936 तक मकर संक्रांति 13 जनवरी को और 1792 से 1864 तक 12 जनवरी को मनाई जा रही थी.

 

15 जनवरी 2026, गुरुवार को देशभर में आस्था और उल्लास के साथ मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। यह पर्व भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण होते हैं। मकर संक्रांति को ऋतु परिवर्तन और नए जीवन चक्र की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति से पुण्यकाल आरंभ होता है। इस दिन गंगा, यमुना सहित पवित्र नदियों में स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फल देता है। तिल, गुड़, खिचड़ी, वस्त्र और अन्न का दान विशेष पुण्यदायी माना गया है।

 

मकर संक्रांति का पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे खिचड़ी पर्व के रूप में मनाने की परंपरा है, वहीं महाराष्ट्र और गुजरात में तिल-गुड़ बांटकर आपसी सौहार्द का संदेश दिया जाता है। पंजाब में लोहड़ी और दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में यह उत्सव किसानों के लिए नई फसल के स्वागत का पर्व बन जाता है।

 

इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा भी खास है। आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, जो उत्साह, स्वतंत्रता और आनंद का प्रतीक मानी जाती हैं। साथ ही मकर संक्रांति सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी संदेश देती है। उन्होंने कहा कि लोक हित को ध्यान में रखते हुए चाइनीस माझा का प्रयोग ना करें। सरकार ने इसे पूरी तरह बैन कर दिया है। बच्चों पर विशेष ध्यान रखें पतंग बाजी करते समय छतों पर से भी गिरने का भय बना रहता है।

 

मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और आस्था के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही यह पर्व जीवन में सकारात्मकता, ऊर्जा और नव उत्साह का संचार करता है।

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