शिवगढ़ गौशाला में फिर गोवंश की मौत, व्यवस्थाओं पर उठे सवाल

*शिवगढ़ गौशाला में फिर गोवंश की मौत, व्यवस्थाओं पर उठे सवाल*

 

*एफपीओ को संचालन सौंपने के बाद भी नहीं थमी दुश्वारियां, जिम्मेदारी और निगरानी को लेकर प्रशासन से जवाब की मांग*

दधीच विश्वकर्मा

लम्भुआ (सुलतानपुर)। विकासखंड लम्भुआ के शिवगढ़ स्थित निराश्रित गोवंश आश्रय स्थल में गोवंश की दुर्दशा और मौत का मामला एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व में अव्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठने और खबरें प्रकाशित होने के बाद एक मई 2026 से गौशाला का संचालन ग्राम प्रधान से हटाकर मानव कल्याण कृषि प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (एफपीओ) को सौंपा गया था। इसके बावजूद अब गोवंश की मौत की सूचना सामने आने से गौशाला की व्यवस्थाओं और निगरानी पर सवाल खड़े हो गए हैं।

बताया गया था कि संचालन एफपीओ को सौंपे जाने के समय गौशाला में करीब 250 गोवंश थे, जबकि इसकी क्षमता लगभग 150 गोवंश की बताई गई थी। जिम्मेदारी हस्तांतरित होने के बाद व्यवस्थाओं में सुधार की उम्मीद जताई गई थी। ऐसे में अब गोवंश की मौत की खबर सामने आने पर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर व्यवस्था में कितना सुधार हुआ और गौशाला की नियमित निगरानी कौन कर रहा है।

चारा-पानी और जलनिकासी को लेकर पहले भी उठे थे सवाल

पूर्व में गौशाला की स्थिति को लेकर चारे, हरे चारे, पानी, जलनिकासी समेत अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी के आरोप सामने आए थे। निरीक्षण के दौरान कुछ गोवंश बीमार भी पाए जाने की बात कही गई थी। अब दोबारा मौत की सूचना सामने आने के बाद इन व्यवस्थाओं की मौजूदा स्थिति की जांच जरूरी हो गई है।

सरकारी दावों और धरातल की स्थिति में अंतर?

प्रदेश सरकार गोवंश संरक्षण के लिए लगातार योजनाएं संचालित कर रही है और गौशालाओं को संसाधन उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है। ऐसे में सरकारी संरक्षण वाली गौशाला में गोवंश की मौत का मामला सामने आने पर संचालन संस्था के साथ-साथ संबंधित विभागीय अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

गौशाला की वर्तमान स्थिति से संबंधित जीपीएस एंगल कैमरे से ली गई तस्वीरें उपलब्ध होने की बात भी सामने आई है। प्रशासन चाहे तो इन तस्वीरों और मौके का भौतिक सत्यापन कराकर वास्तविक स्थिति की जांच कर सकता है।

जांच हुई तो सामने आएगी असली तस्वीर

गोवंश की मौत के कारणों की स्पष्ट जानकारी के लिए प्रत्येक मृत गोवंश का पशु चिकित्सकीय परीक्षण अथवा पोस्टमार्टम कराया गया या नहीं, यह भी जांच का विषय है। इसके अलावा गौशाला में वर्तमान में कितने गोवंश हैं, कितने बीमार हैं, प्रतिदिन कितना भूसा, हरा चारा और पशु आहार उपलब्ध कराया जा रहा है तथा पशु चिकित्सक कितनी नियमितता से निरीक्षण कर रहे हैं—इन बिंदुओं की भी जांच जरूरी है।

अब ग्रामीणों और पशु प्रेमियों की निगाह प्रशासन की जांच पर है। सवाल यह है कि एफपीओ को संचालन सौंपे जाने के बाद भी यदि गोवंश की मौत हो रही है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी? प्रशासन द्वारा मौके का निरीक्षण कर मौत के कारणों की जांच और व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ रही है।

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