गुड़िया लेटने की परंपरा मुख्य रूप से पूर्वांचल और अवध (जौनपुर, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रयागराज आदि) की लोक परंपरा है। यह नागपंचमी से जुड़ी हुई है और सदियों से गांवों में चली आ रही है।
गुड़िया लेटने की परंपरा क्यों शुरू हुई?
लोक मान्यता के अनुसार, वर्षा ऋतु में खेतों और बिलों से साँप बाहर निकलते हैं। खेती-बाड़ी के दौरान अनजाने में साँपों की मृत्यु न हो और मनुष्य व प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे, इसलिए नागदेवता की पूजा का प्रचलन हुआ। इसी के साथ “गुड़िया लेटने” की परंपरा भी विकसित हुई।
एक लोकप्रिय लोककथा के अनुसार, एक परिवार की बेटी की साँप के काटने से मृत्यु हो गई। परिवार ने नागदेवता से प्रार्थना की और नागदेवता की कृपा से संकट दूर हुआ। इसके बाद लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से कपड़े की गुड़िया बनाकर नागदेवता से परिवार की रक्षा की प्रार्थना करनी शुरू की। समय के साथ यह लोक परंपरा बन गई।
गुड़िया क्यों लेटाई जाती है?
कपड़े की बनी गुड़िया मनुष्य का प्रतीक मानी जाती है। इसे भूमि पर लिटाकर या किसी निर्धारित स्थान पर रखकर यह संदेश दिया जाता है कि मनुष्य प्रकृति और नागदेवता के प्रति विनम्र है तथा उनसे रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना करता है।
ऐतिहासिक दृष्टि
इस परंपरा का कोई स्पष्ट उल्लेख प्रमुख पुराणों या धर्मग्रंथों में नहीं मिलता। इतिहासकार इसे लोक संस्कृति का हिस्सा मानते हैं, जो कृषि प्रधान समाज में प्रकृति, वर्षा और नागों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए विकसित हुई। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी विधि और मान्यताएँ अलग हैं।
आज भी जौनपुर, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर के अनेक गांवों में बच्चे और महिलाएँ नागपंचमी के दिन यह परंपरा निभाते हैं और नागदेवता से परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल तथा सर्पदंश से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
